शायर तो नही है।
पर शायरी कह जाते है।
हजारों की भीड़ में भी तन्हा रह जाते है।
जज्बात ही बेअसर है
या
हम ही पत्थर बन गए।
गम के मौसम में आंसू भी न बहा पाते है।
खुशियां तो यू ही कम देखने को मिलती है।
उसमे भी मुस्कुरा भी न पाते है।
सूरत अपनी आईने में देख पहचान ही न पाते है।
कभी कभी चलते चलते चलना ही भूल जाते है।
हमारी ही कोई परवाह नही करता या
हम ही दुनिया से दूर हो गए है।
अपनों की भीड़ में पराए से बन जाते है।
और परायों से भी अपनेपन की उम्मीद लगा जाते है।