हर बार सोचता हूँ
क्रोध नहीं करूँगा
पर क्रोध आ जाता है।
हर बार सोचता हूँ
शान्त रहूँगा
पर अशान्त हो जाता हूँ।
हर बार सोचता हूँ
राह पर रहूँगा
पर राह भूल जाता हूँ।
हर बार सोचता हूँ
प्यार से रहूँगा
पर प्यार से भटक जाता हूँ।
हर बार सोचता हूँ
"वसुधैव कुटुम्बकम"
पर अपने कुटुम्ब में झगड़ने लगता हूँ।
* महेश रौतेला