कविता- खत
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हाँ! मैं खत हूँ .....!
कहने को कागज भर का टुकड़ा
पर दिलों में उमड़े जज्बातों का गुबार हूंँ।
प्रेमी दिलों के मधुर भावों का आगाज हूँ।
सुनहरे भविष्य की कल्पना साधे
एक का दिल, तो दूजे का संसार हूँ।
दूर सरहद पर बैठे सिपाही का वादा हूँ
पहली विरह वेदना से व्याकुल
पत्नी का इंतजार हूँ।
अकेलेपन में उनका साथी
दूर रहकर भी जो एक दूजे के जोड़े मैं वह तार हूँ।
परदेस गए बेटे को बूढ़ी माँ का मनुहार हूँ
घर आजा बेटा माँ के मन की आवाज हूँ
आॅंसुओ की स्याही और
काॅंपते हाथों से लिखा खत
उम्मीदों का भंडार हूँ।
दिल को दिल से जोड़े मैं वह आधार हूँ
थमी हुई अनगिनत आशाओं का भर्तार हूँ।
हां! मैं खत ...कहने भर को
कागज का टुकड़ा पर
अपने आप में समेटे
खुशी गम विरह मिलन का संसार हूँ।
©
अर्चना राय