तुम क्या बिछड़े भूल गये
रिश्तों की शराफ़त हम...
जो भी मिलता है कुछ दिन ही
अच्छा लगता है....
अब भी यूँ मिलते हैं हमसे
फूल चमेली के
जैसे इनसे अपना कोई
रिश्ता लगता है...
और तो सब कुछ ठीक है लेकिन
कभी-कभी यूँ ही
चलता-फिरता शहर अचानक
तन्हा लगता है.......
निदा फ़ाज़ली