जज़्बात उमड़ कर यूँ जब होठों पे आ गए।
लफ्ज़ थे ख़ामोश अश्क़ रुख़सार पे आ गए।
सोचा ख़ामोशी भी इख्तियार करना अच्छा है।
मुझे छोड़ कर दरिया में खुद साहिल पे आ गए।
अक्स छुपा कर वो मिलते रहे जमाने से ।
जब बात आई सच की तो चेहरे मुरझा गए।
कोई हाथ थाम ले तो डूबने से बच जाऊंगा।
भ्रम टूट गया मेरा ,मेरे अपने ही मुझे डुबा गये।
हम किस किस की बददुआ लें अपने सिर "अर्जुन"।
कुछ से हमने किया किनारा तो कुछ खुद बदल गए।।
-Arjun Allahabadi