उसके पहलू से लगके चलते है
हम कहीं टालने से टलते है
में उसी तरह तो बहलता हु यारोँ
और सब जिस तरह बहलते है
वो है जान अब हर एक महफ़िल की
हम भी अब घर से कम निकलते है
क्या तकल्लुफ़ करें अब ये कहने में
जो भी ख़ुश है, हम उससे जलते हैं
है उसे दूर का सफ़र दरपेश
हम संभाले नही संभलते है
है अज़ब फ़ैसले का सेहरा भी
चलना पड़िये, तो पांव जलते है
हो रहा हु में किस तरह बर्बाद
'देखने वाले हाथ मलते हैं'
तुम बनो रंग,तुम बनो खुशुब
हम तो अपने सुखन में ढलते हैं
John Elia ki Shayri ...