प्रेम का कोई रुप नहीं,
ये तो बस ...
मुस्कराते हुए चेहरे में दिख जाता है,
करुणामय हृदय में बह जाता है,
उम्मीद भरी आँखों में उग जाता है,
ममता के आँचल में पलता है,
कभी आँसू बन के भी निकलता है,
दो अंजानों में भी पनप जाता है,
न जाने कब ये दिलों में समा जाता है,
रुप बदल बदल के ये मिलता है ,
रुपरेखा नहीं इसकी,
अनंत में विचरता है,
असंभव इसकी व्याख्या है ...
नहीं पता ...
मैं कौन हूँ ,
कहाँ हूँ ???
जहाँ प्रेम है ...
मैं वहीं हूँ !!!