बहुत दिनों तक हम रहे जीवित
फिर मरे तो मरे ही रह गये,
झंडा हमारा फहरा था ऊँचा
कदम हमारे बढ़े थे शिखर तक।
कहाँ-कहाँ की आवाज हम बने थे
कहाँ-कहाँ तक दिखायी दिये थे!
हमने बनायी प्यार की दिशायें
वहाँ लिखी फिर अपनी सजायें।
फिर हड्डियों से धुआँ उड़ा था
मनुजता के लिये मन चला था,
मर कर हम जिन्दा हुये थे
कदम हमारे अडिग बने थे।
**महेश रौतेला