जिंदगी जीने पर इस जहाँ में हम कहीं मशवरा करते रहे,
न जाने क्यों उसके साथ जीने के लिए ताउम्र का वास्ता देते रहे।
इश्क़ में महबूब से बहुत गुस्ताखी की गुजारिश कर रहे,
फिर भी ना जाने उसे खता ए माफी माँग जीने की नुमाइश करते रहे।
छाव भी अंबर की तरह जिंदगी बसाने में जुल्फो से उलाजते रहे,
आग कुछ ऐसी थी कि उनके कंधे पर सिर रख कर खुद को बेपनाह सुकून देते रहे।
हर जगह हर सफ़र मे हम पनाह ए दहलीज से जैसे दूर होते हुए उन्हें ढूंढते रहे,
हम तो उनकी तलाश में थे और न जाने कहा जहां से पता-ए -महबूब का गुम होते रहे।
बेखुदी के दर्द से हमदर्द बना कर हर जगह इम्तिहान से मोहोब्बत के सिलसिले जाहिर करते रहे,
खुदा से हररोज तकरार कर क्या है क्यू है यही बातो में दिन निकालने में खुद में जलते रहे।
इश्क के सफ़र मे साथ बिताए पल पल को बिछड़ ने की बात से जुदाई से जुड़ा संग से मरने लगे,
हम ना जाने कौनसे जन्म के सदमे से जन्म जन्म की हकीकत में पनाह दे कर जीने की अदा करते रहे।
DEAR ZINDAGI 💞🌹