और फिर रोना धोना सब ढोंग लगने लगता है,अपने दर्द को हम किसी से नही कहते,क्योंकि हमें एह्साह हो जाता है,तितली के पंख पे उभरे हुए दृश्य भले ही किसी घाव के हो,लोग मज़े ही लेंगे पकड़ के,तो हम ख़ामोश हो करने लगते है इंतजार अपने ईश्वर का,कि वो आ के पूछे हमसे तकलीफ क्या है !!