शाम तेरे मन की है
सुबह मेरे मन की
फिर यह रात अकेली
किस भरोसे चुप रहती है
पिंजरे में बन्द चिड़िया
टोकरी में रखी गुड़िया
बोलती तो नही है कभी
आँखों से कुछ कह जाती है
पीली पत्तियाँ सूखी टहनियाँ
सुनहरी दोपहर अकेली रातें
विपरीत प्रकृति है दोनो की
फिर भी साथ निभाती है
इंतहा होती है हर बार
उसके आने के इंतज़ार की
कभी जल्दी आया देख कर
क्यों आंखें बरस जाया करती है
शाम तेरे मन की है
सुबह मेरे मन की
फिर यह रात अकेली
किस भरोसे चुप रहती है
-Neelima Sharrma Nivia