काश ! हम भी टीवी के वह धारावाहिक का एक किरदार होते - By Srishti Chouhan
काश ! हम भी एकतरफा जिंदगी जीते,
पैर ज़मी पर न होते पर, पर हमारे आकाश में उड़ते,
काश हम भी टीवी की वह धारावाहिक का एक किरदार होते,
जो मर कर भी जिंदा हो जाते है,
और फिर ज़िंदा होकर मर जाते है,
हार्ट अटैक जैसे सर्दी खासी हो जाते,
हॉस्पिटल के हर रूम हवादार होते
काश हम भी tv की वह धारावाहिक का एक किरदार होते,
मरने के बाद प्लास्टिक सर्जरी शस्त्र के द्वारा कोई दशावतार होते,
उमर हमारी साठ की होती मगर, हमारी जवानी तीस पार भी न होती,
जैसे पतझड़ में झड़ते पत्तों की चढ़ती हरियाली
तरु के ज़र को भी अजर यौवन गढ़ जाते है!
इंग्लिश सूट पहन कर, कुछ सच्चे कुछ झूठे
मंतर पढ़कर जहां शादी का खर्चा एक
सेट के आधे सजावटों वाली ही हो जाती है
ना कोई पंडित, ना कोई काज़ी,
गठबंधन नायिका की चोली से बन जाती है
काश! हम भी टीवी की वह धारावाहिक का एक किरदार होते
गुस्ताखियों के दौर के हम भी नकली सरताज होते
कैमरे के हाई पिक्सेल वाले एडिट फिल्टर्स सी मुस्कान होती, काम में तो जाने को तैयार निकलते,
पर घर आने में न शाम होती,
न कोई बॉस होता ना जिल्लतें सरेआम होती
चाबियों वाली बहु और धाकड़ सास होती
सजीला साजन होता संस्कारी बहु का और
एक मिडिल क्लास फैमिली की स्टोरी में हनीमून,
पेरिस वाले सीजंड लव की आस होती
बस रोल कैमरा एक्शन में ही लिपटी ज़िन्दगी की अरदास होती|
तन्हाइयों की सिलवटे हज़ार होती,
नारी को अबला दिखाने की कोशिश बार बार होती
काश हम भी टीवी की वह धारावाहिक के किरदार होते
जहाँ गिलसरीन वाले आंसू आम और ज़िन्दगी के हर तराने
का क्लाइमेक्स वाच न नेक्स्ट एपिसोड होते
जिन औरतों की बिंदी नाक से भी बड़ी होती, वह खेलो की खलनायिका होती,
कोर्ट में , ' माई लार्ड! के पुराने दलीलों में केस सॉल्व हो जाते
सोकर भी वही संवरी और सजीली ब्यूटी की ताजा प्रोडक्ट वाली माल होती,
रिटेक और ब्रेक के कड़ियों में सिरिअलाइज़्ड लाइफ फ्रेम में कैच होते,
काश ! हम भी टीवी की वह धारावाहिक के एक किरदार होते!
जहां सब नकली होता पर हम असल होते......