बेटी
बेटी मेरी,आंखो का नूर,
तेरे से हैं घर की रौनक ,
तेरे से ही हैं इस घर की बरकत
तुमसे ही हैं दिन और रात मेरी
अब कैसे कह दूं तुमसे के तुम हो इस घर की पराई
कहते हैं लोग बेटी को ना पढ़ाओ,ना बाहर जाने को कहो ,ना ज्यादा दोस्ती को कहो
छोटे कपड़े ना पहनाओं,ना कहो के किसी से खुल के बात करो,
तो कह दू ऐसे इंसान को जब एक पिता को कोई दिक्कत नहीं तो ज़माने वाले को क्यो इतनी दिक्कत
वो वहीं ज़माने वाले हैं
जब बेटियों को जलाई जाती हैं तो लोग तमाशा देखते हैं
फिर कहां जाती हैं उनकी ये सब बातें
बातें तो बनाते हैं लोग,आदत हैं बस में यही कहूंगी
मेरी बेटी ,मेरी इज़्ज़त, मेरा गुरूर,
फिर क्यों हैं किसी की सुननी