दुख को मैंने नहीं नापा है
विषम भाव भी आ जाता है
अँधकार कहीं छा जाता है,
कांटे-कष्ट चुभ जाते हैं।
शोक संदेश मिल जाते हैं
राहें टेड़ी हो जाती हैं,
युद्ध बीच में दिख जाते हैं
सपने बीच में रूक जाते हैं।
समय में छेद बहुत हुये हैं
मिथ्या -झूठ सब निकल गये हैं,
घाव दिनों दिन बढ़ जाते हैं
रोग-शोक भी जुड़ जाते हैं,
दुख को मैंने नहीं नापा है।
* महेश रौतेला