रिश्ते मुफ्त में नही बनते
विश्वास और प्रेम से सहेजना पड़ता है।
जिस तरह माली पौधों को प्यार करता है
दुलारता है और स्नेह से संवारता है वैसे ही
समय के साथ रिश्तो को मजबूत बनाना पड़ता है
कभी कभी गलतियां न भी हो तो फिर भी
खुद की ज़िद को छोड़ के अपनों को मनाना पड़ता है
यही तो है जिंदगी ,जीने का फ़लसफ़ा यही
गहरे जख्म क्यों न हो सीने में
अपनों के ख़ुशी के लिए मुस्कुराना पड़ता है
भले तुम्हें महफ़िल से किसी ने रुसवा किया हो
मगर कोई अपना बुलाये तो आना पड़ता है।
लाख ज़ख्म मिले हो तुमको मगर ।
दूसरों को दिखाने के लिए मुस्कुराना पड़ता है
कोई क्या समझेगा तुम्हारे जज़्बात को
तुम्हारे कहे गए एक एक अल्फ़ाज़ को
लाख बुरा करे तुम्हारा खुदा मगर
उसके सब को शीश झुकाना पड़ता है।