अच्छा ही हुआ असद ओवैसी बिहार में जाकर एक विकल्प की तौर पर काम किया । 70 सीटों पर लड़ने वाली काँग्रेस के 19 विधायक अपने आप में ही एकजुट नही है । खबर है के विधायक दल का नेता चुनते वक़्त दो गुटों में जमकर हंगामा/हाथापाई हुई । अब ऐसे लोगों को अपना नेता बनाए जो खुद एकजुट ना हो और मेवा खाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो तो सहाब भगवान् भी क्या भला करे मतदाताओं का ? एक ख़बर ऐसे भी चल रही है के बीजेपी NDA की ताक़त बढ़ाने के खातिर पुरी कोशिश में लगी हुई है । अब सबसे ज्यादा खतरा तो इधर ही दिख रहा है । जब पुरे देश में माहौल काँग्रेस के खिलाफ़ बनाया जा रहा है - सत्ता में ना रहते हुए भी काँग्रेस के साथ अलग चमत्कार होते हुए दिख रहा है तब ऐसे परिस्थितियों में काँग्रेस के विधायक को ही नही आम कार्यकर्ताओं को भी सजग रहना जरूरी है । अन्यथा काँग्रेस का कल्याण तय है । और हम विकल्प ना तलाश करें तो हमरा भी !
हम तों डुबेंगे ही पुरे ...