ये समय है जिसने अंनत दरिया को पार करते हुए देवता या असुर से लेके इंसान ओर यहां से लेके सूक्ष्म जीव का निर्माण और अंत होते हुए देखा है, एक आवर्तन को निरपेक्ष रूप से बीतने के लिए जो चाहिए वो समय है , समय पराकाष्ठा से परे है, ये वो अवकाश है जो आकाशगंगा के निर्माण और अंत को देख रहा है,
अंनत युगों के बदलते रूप को उस एक एक क्षण को समय है जिसने नापा है, वो पहेलियां जो आज अक्षम रहष्य है उसे बनते ओर उन पहेलियों के हल होने तक के सफर को सिर्फ समय ने नापा है ।
ओर हम तुच्छ इंसान उस समय से लड़ते हुए यही अनंत चक्र में खो जाने वाले है, समय अपने आप मे रहष्य है , अनंत कुंजियों को ये पिटारा जिसने भी खोला होगा उसे हम इंसान अपने से बढ़कर मानते हुए देवता या असुरो का दर्जा दिया है।
जरा सोचिए धर्म जिसपे इंसान आज खड़ा है , ये चौथे चरण के अंत तक खुद देवताओ में सुमार होने लगा है। एक जीव जिसको हमने जन्म लेते देखा है उसे हमारे बीच चलते देखा है उसको हम आज, “बाबा” , “साधु” नजाने कितने नाम और पदवी देकर साक्षशात ईश्वर का रूप मानने की पक्रिया में परिवर्तित कर देते है , ओर इसी तरह धर्म को एक जीने का जरिया बनाने की जगह, हमने खुद परोक्ष के स्थान पर बिठा दिया है।
ये इंसान ओर जीव का अंतिम युग है और हम खुद इसके पतन की ओर आगे कदम बढ़ा रहे है ।
-dhruv oza.