कभी अपने शहर में
घुस जाइये
चुपचाप प्रवासी पक्षी की तरह,
किसी को बताये बिना,
मत कहिये
मैं किसी राजनैतिक बैठक में आया हूँ,
मत बताइये
मैं किसी आयोजन में आया हूँ।
खड़े-खड़े देखिये
शहर की ऊँचाइयों को,
उस ओर अवश्य देखिये
जहाँ मित्रों के साथ मिल गये थे
स्नेह के थपेड़ों में
उलट- पलट गये थे।
उस शान्ति स्थल पर हो आइये
जहाँ मन स्थिर रहता है,
कह दीजिये
समय से चुप रहने को,
कान लगाकर सुनिये
कितने संघर्ष शहर ने झेले हैं।
बैठ कर गणना कीजिये
एक जैसी कहानियों की,
प्यार होने से पहले
बिजली गिरने की,
उदासी से उत्साह तक
आते-जाते कदमों की,
उन कहानियों को सोचिये
जो विद्यालय से निकल
विद्यालय में विलीन हो जाती हैं।
क्षणभर शहर की ठंड
क्षणभर शहर की गर्मी में हो आइये,
देख आइये
पेड़ों की लम्बी छायायें,
वृक्षों की आयु लम्बी होती है
इसलिए उन्हें चूम आइये।
चाय की चुस्कियों में
शहर को घेर लीजिए,
प्यार आकाश से नहीं टपकता
शहर में होता है घेंघे की तरह।
जब रात होने लगेगी
चलने लगोगे
प्यार के मार्गों को समेट कर,
प्राकृतिक अँधेरा कष्ट नहीं देता
बड़ा आराम देता है,
उठकर उस ओर देखना
जिधर कुछ नहीं दिखता है
लेकिन सब अपने स्थान पर रहता है।
मनुष्य सूरज की तरह नहीं होता है
जो हर दिन चमकता रहे यही सोचना।
**महेश रौतेला