डर लगता हैं ,
कभी खुद से तो कभी ख्वाबों से लगता है ।
डर लगता हैं ,
कभी दौड़ते दौड़ते गिरने से तो कभी कोशिश न करने पर अपनी ही आंखो में गिरने से लगता है ।
डर लगता हैं ,
कभी मंज़िल ना मिलने पर तो कभी ज़िन्दगी की दौड़ में खुद से बिछड़ जाने पर लगता है ।
हा ' हीर ' डर लगता हैं ,
कभी टूटती आश से तो कभी आंखो से बहनेवाले आंसू की बूंदों से लगता है ।।।
- जानकीबा डाभी ( हीरकुवरबा )