मुझे खेद है , मेरे मन मे उठते अपनत्व के प्रति, जुड़े रहने पर खुद को हिस्सा और सदस्य मानने के लिए | कलम की रिश्तेदारी बहुत बड़ी है यहाँ खुशी या गम साथ चली आती है, कलम के सहारे चलने वाला शब्दों का मोहताज होता है | किसी के द्वारा बोले हुए शब्द उसमे ऊर्जा, प्राण भर देते हैं जबकि, उसका आभाव क्षोभ दुःख विरक्ति प्रदान करता है | यह शिकायत मुझे उस घर से है जिसका मै स्वंय को सदस्य मानती रही हूँ | बेशक एक वर्ष कम हुआ तो क्या हुआ, एक घर से दूसरे घर की उन्मुखता तो है पर, बड़ी निराशा हुई कि मातृभारती के लिए हम कोई अहमियत नही रखते, न ही हमारा जन्मदिन |
#माफी