माँ
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केवल तेरे ही अधरों पर गीतों की गुन-गुन होती है
केवल तेरे ही चलने से झंकार प्रस्फुटित होती है
तेरे होठों पर लोरी है,फिर चँदा और चकोरी हैं
घी-माखन से भरी हुई सुंदर सी एक कटोरी है
तेरे आ जाने से महके हैं द्वार सभी दिशाओं के
तेरे कोमल सुर में झंकृत रहते हैं गीत हवाओं के
तेरी ऑंखों से बरस रहे हैं गंगाजल के फ़व्वारे
सारा जीवन अंधड़ ओढ़ा ,स्नेह-प्रीत मुझ पर वारे
माँगा जब भी चँदा मैंने ,थाली में ला बैठाया है
फिर आँचल में भरकर मुझको गीत सुरीला गाया है
तू यहीं कहीं छिप बैठी है ,मेरे मन की अँगनाई में
मुझमें जो कुछ भी ज़िंदा है ,तेरी ही तो परछाई है
तेरा अस्तित्व न मुझमें हो ,यह तो नामुमकिन होता है
माँ तू ही तो है कल्याणी ,आशीषों का एक सोता है |
डॉ. प्रणव भारती