कभी कभी सोचता हूँ
बैठे-बैठे बात की जाय,
फिर विचार आता है
किसे,किस लिये?
लोग सब कुछ जानते हैं
बातें बहुत दूर तक ले जा
लौटने नहीं देती हैं
जीवन को समझिये और समझते रहिये।
कुछ कहूँ
और सुनने वाला सुन न पाय
या अनसुना कर दे,
या उसे अच्छी बात बुरी लग जाय,
बातों को समझिये और समझते रहिये।
बैठे-बैठे क्या किया जाय
अपने टूटे रास्तों को जोड़ा जाय,
घर की दीवारों में झाँका जाय
प्यार को समझिये और समझते रहिये।
** महेश रौतेला