“क्या माँ, आज भी टिंडे की सब्ज़ी। मुझे नहीं खाना ये सड़ा खाना”, अतुल ने खाने की प्लेट को ज़ोर से सरकते हुए कहा।
“बेटा। सुन तो। अच्छा ले आलू छौंक देती हूँ। चल अब नाराज़ ना हो।”, माँ ने कहा।
“पूरा दिन कॉलेज में रही फिर घर आ कर ऐसा खाना खाने से अच्छा है कि मैं बाहर से ही खा आया करूँ। पर अब क्या करें हमारे पास तो पैसे भी गिनती के होते हैं।”, अतुल ने ग़ुस्से में कहा।
“अच्छा बेटा। अब नाराज़गी छोड़ो। आज पिताजी को तनख़्वाह मिलेगी ना, उनको कहूँगी तुझे दो सौ रुपये दे देंगे तुम कल दोस्तों के साथ मर्ज़ी का खा आना”, माँ ने समझाया।
“ चलो दो अब क्या दे रही हो खाने को। जल्दी लाना। बहुत भूखा हूँ”, अतुल ने फिर से चेताया।
माँ भागती हुई रसोई में गयी और दो आलू बना लायी।
अतुल ने अपने दोस्तों से फ़ोन पर बतियाते हुए खाना खाया और खाने के बाद प्लेट सरका कर लेट गया।
अतुल की माँ ने समय देखा। चार बज चुके थे। उन्होंने रोटी का डब्बा खोला और अपने लिए बनाई हुई दो रोटियों को ज्यों का त्यों रख दिया और रात का खाना बनाने में जुट गयी।
शाम को अतुल के पिताजी आए और उन्होंने महीने के ४००० रुपये अतुल की माँ को पकड़ा दिये और कहा, “उमा, इस बार दस रुपये की गुंजाइश नहीं है। अतुल को शहर भेजना है आगे की पढ़ाई के लिये। अब जैसे तैसे इस ही में से महीना चलाना। सिलेंडर, बिजली का बिल और राशन। सब इसी में से होना है। मुझे पता है कि मैं तुम्हें रश्मि की शादी में पहनने के लिए साड़ी नहीं दिला पाऊँगा। पर समझना”, उमा ने सिर हिलाया। फिर कुछ हिसाब किया और दो सौ रुपये निकाल कर अतुल के हाथ में पकड़ा दिए और इशारे से चुप रहने को कहा।
अतुल ख़ुश था। दो सीन बाद शहर जो जाना था। उसने दोस्तों के साथ मस्ती की और घर आ कर अपनी पसंद की भिण्डी की सब्ज़ी, पूरी, पनीर की सब्ज़ी देख कर खाने पर टूट पड़ा।
“तुम भी खा लो साथ में। हम फिर हफ़्ता भर शहर में रहेंगे अतुल के साथ”, अतुल के पिता ने कहा।
माँ ने बहाना बना कर टाल दिया। अतुल पिताजी के साथ शहर को रवाना हुआ और उमा ने बची सब्ज़ी भी अतुल के लिए डिब्बे में डाल कर साथ दे दी। उनके जाने के बाद आँखों में आँसु लिए उसने जैसे तैसे दो पूरी गले से उतारी।
दिन बीते। हफ़्ते बीते।
अतुल को शहर अच्छा लगा लेकिन ना जाने क्यूँ उसे टिंडे की सब्ज़ी खाने का मन करने लगा। परीक्षा सिर पर थी। वो किराए के कमरे में आया। भूख लगी थी। बासी रोटी निकाली और माँ को फ़ोन किया, हाल-चाल लिया।
“क्यूँ?अब तो ख़ुश होगा ना। अच्छा खाना खाता होगा।,”
“अच्छा है माँ। बहुत स्वादिष्ट। तूने खाना खाया?”, अतुल ने भरे गले से कहा। वहाँ उमा ने अपनी रोटी वापिस डिब्बे में रख कर बोली, “हाँ बेटा! मैंने भी बहुत स्वादिष्ट खाना खाया”।
#स्वादिष्ट