अकसर तुझे देख के में सबकुछ अनुकरण करता हूँ,
तू खयाल में है या बेखयाली में, उसमे जूजता रहता हूँ।
मेरे दिए खुशियों के लिफाफे में कई कसर ढूंढता रहता हूँ,
कई मर्तबा हवाओं के जरिए तेरे अल्फ़ाज़ को सुनता रहता हूँ।
इश्क़ की बराबरी में जहाँ से कहीं अधिक चुनता रहता हूँ,
तेरे दर्द में मेरे इश्क़ से हर वक़्त जख्म पर महरम लगाया करता हूँ।
आंसू ना आए तेरे, दिल में जुड़े जज्बातों से ये आलम अदा करता हूँ,
हो गुस्सा तू तो मैं अक़्सर टूटकर भी कई बार संभलता रहता हूँ।
बोल तो देती हो कुछ नहीं फिर भी ये तेरे आंखो में घूँटन देखता हूँ,
नजर छुपा भी लेती हो मेरे सामने जूठ बोलने से, येभी महसूस करता रहता हूँ।
जूठ तो बोल नहीं पाते, फिर भी कई बार किसी वज़ह से कदम पीछे हटाते देखता रहता हूँ,
फिर भी ना जाने में तुझे खुदकी तस्वीर को तेरे दिल ख्वाहिश की तरह छुपी देखता रहता हूँ।
हा है तेरे मेरे रूह से ए इश्क़ कई बार ख़्वाबों की तरह जिसमें मैं बिखरता रहता हूँ,
हा तुझे प्यार है फिर भी ना जाने खुदको खूदके अरमानों पर पानी फेरता देखता रहता हूँ।
DEAR ZINDAGI 💞