सड़क छाप
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आज दो महीने बाद कचहरी जा रहा हूँ ..घर से कुछ ही दूर आया हूँ कि सड़क के खड्डों में हिचकोले खाती मोटर सायकिल खड्डों के कचट से पंचर हो गयी है..पंचर मोटर साइकिल खींचते हुये ही अब आगे बढ़ना है..
मेरे गांव मोकल पुर से जो सड़क कचहरी गोण्डा को गयी है, भारत के अन्य गावों की सड़क से भिन्न नही है..मोदी ने कभी कहा था कि सड़कें ऐसी हों कि उनसे आप प्रगति आंके..पर बन रही सड़कें छः माह में ही अपनी खोयी हुयी गरिमा पुनः पा लेती हैं.. कहीं पढ़ा था कि सड़क का इतिहास व्यक्ति के प्रथम बार घर से निकलने से जुड़ा है..इतना समय बीत गया पर सड़क छाप की गरिमा आजतक बनी ही है..यदि लालू यादव ने सच में सड़कों को हेमामालिनी के गाल जैसी चिकनी बना दी होतीं तो 'सड़क छाप लल्लू, सड़क छाप मजनू, सड़क छाप हीरो ' जैसे शब्द युग्म आज गायब हो रहे होते..
मेरे गाँव की मिट्टी बड़ी उर्वर है..प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राजा देबी बख्स सिंह की सेना में सामिल मोकल पुर के जवानों की गाथा बूढ़े बुजुर्ग अब भी सुनाते हैं.. इस प्राचीन गाँव का अपना गरिमामयी इतिहास है..अवकाश प्राप्त डी जी पी अपने पुरखों का घर देखने वर्ष में एक बार गाँव आते तो अवश्य हैं पर उन्हे भी हिचकोले खाने में अद्भुत आनंद आता है..आखिर एक दिन रहकर चले जाना है..एक दिन में कौन सी कमर टूट जानी है..आज भी गाँव में इंजीनियर, डाक्टर, वकील, पत्रकार, प्रोफेसर, आई पी एस, एच जे एस, कवि, लेखक ,अभिनेता यदि हैं तो एक बिरादरी नेता वाली कैसे छूट जाती..मोकल पुर में नेता भी हैं.. अखिलेश सरकार में तो राज्यमंत्री भी थे मोकल पुर से..नेता इतने जमीनी हैं कि नेतागीरी के बाद वे बड़े काश्तकार बन गये..पर सड़क छाप की गरिमा बचाये रखने के लिये आज तक सड़कों को खड्डों से मुक्त नही होने दिया..
फिलहाल पंचर वाले की दूकान आ गयी है..अब सोचना बन्द करता हूँ..पंचर बन जाय तो यह सड़क छाप वकील दो महीने बाद कचहरी में अपनी सीट पर
राजेश ओझा