इस तथाकथित संसार में जब कभी कोई मुझसे पूछेगा प्रेम का मूर्तरूप, तो मैं कैनवास पर तुम्हारी तस्वीर बनाऊंगी।
जब कभी पूछा जाएगा सुकून के अस्तित्व को, तो मैं तुम्हारे प्रथम स्पर्श पर कोई काव्य की रचना करूंगी।
क्या कभी तुम भरी बारिश में.. बाँहें फैलाए, आँखें बंद कर, गीली मिट्टी पर नँगे पाँव.. खड़े हुए हो..??
यदि नहीं, तो कभी ऐसा करना।
महसूस करोगे तुम प्रेम का बूँद बन तुम पर बरसना..
महसूस करोगे की प्रेम हर एक अंग को चूमते हुए तुम्हारी रूह को आलिंगन में ले रहा है।
बिल्कुल ऐसा ही मैं महसूस करती हूँ, उस समय जब तुम मुझे देखते हो।
किसी शाम जब सूरज अस्त होगा, तो साहिल पर बैठ देखना नदी के बहाव को, अत्यधिक शीतल आनंद होगा तुम्हें, आँखों को सुकून मिलेगा।
यही आनंद मुझे होता है जब मैं तुम्हें देखती हूँ, ऐसी ही शीतलता मेरे हृदय को प्राप्त होती है। ऐसा ही सुकून मेरी आँखों को मिलता है।
किसी रोज़ एकांत में बैठ, रात के अंधेरे में आँखें बंद कर सीने पर हाथ रख, अपने हृदय को स्पर्श करना और हृदय की आवाज़ सुनना।
उस वक़्त जो तुम महसूस करोगे वैसा ही तुम्हारी आवाज़ सुन मैं महसूस करती हूं।
कभी मुस्कुराना अकारण ही।
होठों को खोल चारों दिशाओं में शंखनाद की भाँति हँसी को गूंजने देना। जब-जब तुम मुस्कुराआगे, तुम्हारे होठों की हँसी मेरे होठों पर तैर जाएगी।
मुझे तुमसे प्रेम करना ठीक वैसा ही है जैसे प्रेम में डूब आँख मूँदकर महबूब के माथे को चूमना।
किसी मंदिर की दहलीज पर टँगी हुई घंटी का बजना।
किसी मेहंदी लगे हाथ का आँगन में रंगोली बनाना।
किसी मासूम मुस्कुराहट पर दिल आ जाना।
किसी खिले गुलाब की खुशबू का हवा में घुलना,
किसी दीप की लौ से रोशनी का मिलना..
कुछ ऐसा ही है मेरा तुमसे प्रेम करना।
तुम मेरे लिए केवल प्रेम या प्रेमी नहीं हो.. बल्कि तुम मेरे प्रेम का आधार हो। मेरे द्वारा लिखे गए प्रत्येक शब्द का सार हो। मेरी निगाह से देखोगे तो सब जगह प्रेम ही प्रेम पाओगे। हर जगह तुम स्वयं को ही पाओगे।
जिस दिन मेरा प्रेम तुम्हारी रूह स्पर्श कर लेगा,
तुम स्वयं भी प्रेममय हो जाओगो।
उस दिन मैं तुम्हें मूर्तरूप दे, प्रेम को तुम्हारा स्वरूप दूंगी,
इंद्रधनुष के सातों रंग को कैनवास पर उतार,या किसी काग़ज़ पर हर्फ़-दर-हर्फ़ अल्फ़ाज़ उतार।
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