प्रिय,तुम..
ख़त लिखने के कारण को तो तुम जानते ही हो। मैंने पहले भी कहा है मुझे यूँ पुराने तरीके से मोहब्बत का इज़हार करना पसन्द है।
मुझे पसन्द है तुम्हारे लिए कुछ लिखना..।
मुझे पसन्द है पुरानी सी ही सही, मगर पाक रूहानी मोहब्बत।
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ऐसे ही मुझे तुम्हारी सही-ग़लत हर बात पसन्द है।
मुझे तुम पसन्द हो.. बेहद अज़ीज़ हो तुम।
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तुम मुझे कितना जानते हो या जान सके हो मैं नहीं जानती, मगर हाँ मैं तुम्हें ज़रूर जानना चाहती हूँ,
यूँ ही थोड़ा बहुत नहीं, बल्कि बेहद करीब से।
हर एक बात जानना है मुझे।
मैं तुम्हें अपनी आँखों में उतरा हुआ देखना चाहती हूँ,
इतनी गहराई तक जहाँ से बाहर आओ तो अकेले ना आ सको, मेरे आँसुओं को भी बहा लाओ।
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मेरे हर एक ख़्वाब का अंत कैसा होगा ये तो रब ही जाने मगर उसकी मोहब्बत से भरी हुई शुरुआत चाहती हूँ मैं।
हाँ यह सच है मैं तुमसे नाराज़ होती हूँ, मगर यह भी सच है मैंने हमेशा ही तुम्हारी चाहत की वाहिमा की है।
तो क्या यह मुमकिन होगा कि मैं एक दफ़ा ही सही मगर तुम्हें ठीक से देख सकूं..?
निहार सकूँ तुम्हें..??
क्या यह हक़ दे सकोगे मुझे की तुमसे कह सकूँ की मैं तुम्हारे साथ वक़्त बिताना चाहती हूँ, या शायद सच कहूँ तो मैं अपनी पूरी ज़िंदगी तुम्हारे साथ बिताना चाहती हूँ??
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मेरी हर नज़्म, शायरी, ग़ज़ल, हिकायत और मैं.. तुमसे शुरू तुम पर ख़त्म हैं।
क्या तुम मुझे यह हक़ दे सकोगे की मैं तुम्हारे सीने पर हाथ रख मेरी धड़कनों में हुए इज़ाफ़े को महसूस कर सकूँ..?
मेरी हथेली पर तुम्हारी उँगलियों से तुम्हारे ही नाम को उकेर सकूँ..?
तुम्हारे काँधे पर सिर रख सब दर्द भूल सकूँ..??
तुम्हें मेरे दिल से मेरे नसीब में ला सकूँ..?
क्या इतनी इल्तिजा कर सकती हूँ मैं..?
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क्या हक़ दे सकोगे मुझे मोहब्बत का..
तुमसे मोहब्बत का??
कहो..??
तुम्हारी..
सिर्फ़ तुम्हारी
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