Gujarati Quote in Blog by Aarti

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हररोज की तरह मैं अपने आंगन में लगे झुले पर कुछ पढ रही थी। मेरे घर के बाहर ही एक सब्ज़ीवाली औरत सोसायटी की सभी महिलाओं को सब्ज़ी बेच रही थी। वे सब उससे कम दाम कराने पर तूली थी। मुझे उस औरत पर दया आने लगी। बेचारी सुबह से मेहनत कर के, वो भारी टोपला उठा कर घर घर फिर रही थी, और वह सब उससे कम दाम करा रही थी।
मानो मेरे अंदर जगी दया से मेरे अंदर मानवता धीरे धीरे जन्म लेने लगी।

कुछ देर बाद सभी जा चुके थे। उस सब्ज़ीवाली का टोपला अभी भी भरा हुआ था, वो उसे उठा कर अपने सिर पर नहीं रख पा रही थी। मैं सब देख रही थी, पर मैं वही बैठी रही। वो सब्ज़ीवाली एक निचली कौम की थी, और मैं उच्च, अगर मैं उसे छु लेती तो मुझे दोबारा नहाना पडता!

कुछ देर मेहनत के बाद उसका टोपला उठ गया, और वो चली गई। और इसीके साथ कुछ समय पहले जो मानवता मेरे अंदर जगी थी वो भी नष्ट हो गई।

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