#अस्थायी
क्षण में वक्त दौंड़ गया
सब जीवन, सब बीत गया
यह भी बीत जाएगा, रुकता क्या है ?
कल ओर आज भी गुजर जाएगा ,
वर्तमान, अतीत, भविष्य भी बीत जाएगा
धीरे धीरे सबकुछ नष्ट हो जाएगा
संसार क्षणभंगुर है, स्थायी से अस्थायी है
बचपन नहीं रुका, जवानी नहीं रुकी, बढ़ापा नहीं रुका
पेड़-पौधे पनपते, कुम्हलाते, टूटते, गिरते
सब आयु का पतझड़ है, सब सृष्टि का नियम है
खिलना-मुरझाना प्रकृति का खेल है
कुछ नहीं रुक पाया ,आया ओर चला गया
पिता नहीं रूकें, पत्नी नहीं रूकें , बेटे नहीं रूकें
वंश लता लगातार क्रमशः बढ़ती रही
हमारी भूमिका बदल गई, रिश्ते-नाते ड़ोर टूटी, ज़ुडी
सरकारें बदलीं, नेता बदलें, जनता बदलीं
पद बदला, विचार बदला, तरक्की बदलीं
अर्थव्यवस्था की परिभाषा बदलीं ,
नाला बना, नदी बनी, सागर बना
सबमें कितनी बार पानी बह गया
फसलें कितनी बार कट गई ,
अन्न कितनी बार पक गया
जन्म मृत्यु का चक्र चलता रहा
पढ़ाई नहीं रुकी, लिखना नहीं रुका, इम्तहान नहीं रुकी
पाठशाला में छात्र बदल गयें
किताब के पन्ने पलट गयें ,
वक्त का पैंया थमा नहीं
बस्ती विस्फ़ोट नहीं रुका
सब क्षणभंगुर है, सब अस्थायी है ।।
(१३/९/२०२०)
-✍️© शेखर खराड़ी