झूठा श्राद्घ
आज इतनी क्यों चिंता है उनको खिलाने पिलाने की।
है कहीं भी लेकिन अब क्यों समय पर आ जाने की।
क्यों यह झूठा ढोंग दिखाते हो पुराने पुरखों को।
जब था वक्त सेवा पानी का पता नहीं तब मूर्खों को।
झूठी श्रद्धा झूठा श्राद्ध मरने पर क्यों दिखाते हो।
जीते जी क्यों नहीं उनको दिल से तुम अपनाते हो।
भूखे पड़े रहते थे जब तब दिए नहीं कभी खाना पानी
टाल के उनकी बातों को करते थे हरदम आनाकानी।
क्या चाहिए था उनको तुमसे दो वक्त की रोटी।
पूरा नहीं कर पाए तुम उनकी यह ख्वाहिश थी छोटी।
छोड़ आए थे बृद्धाश्रम बन गए थे तुम्हारे सर का दर्द।
किए न्योछावर खुद को लेकीन नहीं कोइ बना हमदर्द।
जो करेगा जैसा उसको भी वैसा पाना है।
देख रही संतान तुम्हारी उनको भी वैसे ही अपनाना है
सच्ची श्रद्धा दिल में थी तो जीते जी क्यों भूल गए।
रह गए रोकते आंसू उनके लेकिन उनसे दूर गए।
कर लो यह ढकोसला यह तो बस दिखावा है।
है सुखी जीवन उसी का जीसने वृद्धों को अपनाया है।
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