क्या खूब कहा था मैंने कभी आज फिर वही दोहराता हूं..
अब तो मरना भी नसीब में नहीं और ना ही ढंग से जीना।
अब तो उसकी दी हुई ठोकरें भी मुझे कब्र से उठा लाती है,
और यादे मुझे कब्र तक पहुंचा आती है, आराम भी नहीं मेरे अंदर और बाहर, दर्द का सैलाब उठता है और सब कुछ बहा ले जाती है।