होनी की गति बड़ी निराली है,
चलती रहती,
चाहे कुछ भी हो,
इसकी चाल कभी नही रुकती,
माया भी यही है,
और उस ईश्वर का खेल भी यही है,
इससे कोई बच नही सकता,
जब भी कोई प्रयास करता,
इसकी गाल से निकलने का,
बारम्बार उसी जगह आ जाता है,
होनी बारम्बार उसे घसीट ले आती है,
कितना भी प्रयत्न करे,
कभी अति बुद्धि लगवाकर,
कभी बुद्धि नहीं लगवाकर,
परंतु हर बार वो वही आ जाता है,
जहाँ उसकी नीयति है।
-Krishnakatyayan