सब कुछ मेरी मुट्ठी में था
कहाँ गिरेगा, मुझे पता नहीं था,
जंगल सब घने उगे थे
कब कटेंगे, पता नहीं था!
नदी साफ- सुथरी बहती थी
कब गन्दी होगी, पता नहीं था,
जीवन पूरा दौड़ रहा था
कब थमेगा, पता नहीं था।
मन में अटूट उत्साह भरा था
कब बुझेगा, पता नहीं था,
प्यार का बढ़ता खाका था
कब टूटेगा, पता नहीं था।
मधुर हँसी में आशायें थीं
कब बीतेंगी, पता नहीं था,
सब कुछ मेरी मुट्ठी में था
कहाँ गिरेगा, मुझे पता नहीं था।
**महेश रौतेला