ये जो लोग मिलते हैं आज कल....
उलझे हुए से सवाल है,
और मुरझाए हुए से ख्याल है।
कोशिश इनकी प्याले भर की,
और समंदर से बड़े ख़्वाब है।
कंकड़ जितनी काबिलियत में,
पहाड़ों वाले अंदाज़ है।
ये ढूंढ़ रहे हैं सच्चा प्यार,
और प्रेमी के लिए बेड़ियां तैयार है ।
तूफानों से ये क्या टकरायेंगे ?
ये सिर्फ अपने घर में ही आजाद है।
महफिलों में गुजरती हैं इनकी रातें,
और कहते खुद को तन्हाई का साथीदार है।
खुद का रास्ता बनाना ये नहीं जानते ,
क्योंकी बहाव के साथ बेहती इनकी नाव है ।
ये जो लोग मिलते हैं आज कल,
जो कहते खुद को असमान हैं ,
अरे! वही जिनके चेहरे को छोड़ बाकी सब समान है।
जिनके उलझे हुए सवाल और मुरझाए हुए से ख्याल है।
श्रद्धा