कभी सोचता हूँ, जिंदगी से क्या चाहता हूँ ?
दो पल सुकून के...
या नीदों से रिक्त रात चाहता हूँ ?
ख्वाबों में जीना..
या ख्वाबों को जीना चाहता हूँ ?
उसे खुद से बांधना..
या उसे खुद से जोड़ना चाहता हूँ ?
मदमस्त, आवारा घूमना चाहता हूँ..
या उसकी बंदिशों में उलझना चाहता हूँ ?
उस रिश्ते को एक नाम देना चाहता हूँ..
या फिर उसे एक नया मुकाम देना चाहता हूँ ?
कभी फिर यूँ ही सोचता हूँ ..
जो पा सका, उसमें खुशी ढूंढना चाहता हूँ..
या जो नहीं मिला, उसके गम में रोना चाहता हूँ ?