मेरे देश की पहुँच
वेदों तक थी, उपनिषदों तक थी,
पुराणों तक थी
सिन्धु तक थी, गंगा तक थी,
रामायण - महाभारत तक थी।
राम और कृष्ण तक थी,
तक्षशिला से नालंदा तक थी,
हिमालय तक थी,
कालिदास से कबीर तक थी
शून्य से अंकों तक थी।
इसी सच्च के बीच ,
इस भाषा से उस भाषा तक थी
मेरे देश की पहुँच
इस पार से उस पार तक थी ।
*महेश रौतेला
१४.०८.२०१४