वो गद्दारों के सारदार तुम्हारी साका नाका
रखते जेहन बदबूदार तुम्हारी साका नाका
ठण्डा चूल्हा तरस रहा है राशन को
बनते फिरते लम्बरदार तुम्हारी साका नाका
दारू पीकर रहे छुपाते गम अपने
यह कैसा हथियार तुम्हारी साका नाका
बाजी जीती जुये में जब ही नाचे तुम
यह कैसा त्यौहार तुम्हारी साका नाका
छुट्टा जानवरों के मुह में फसल गयी
हो कैसे पहरेदार तुम्हारी साका नाका
भाषण सुनकर पेट कभी भर पाया है
हो कैसी सरकार तुम्हारी साका नाका
राशन,पानी,कपड़ा, लत्ता तरस रहे
हो बड़के बर्खुरदार तुम्हारी साका नाका
शादी के पहले महलों की डींग रही
अब कहां गया घरबार तुम्हारी साका नाका
राजेश ओझा