#लिप्त
आज हम हैं लिप्त
सारी वासनाओं में
कल न जाने हों कहाँ
बहती हवाओं में
अहं की इस कीच से
खुद को निकालें हम
और फिर इक कमल सा
जीवन बना लें हम
बहुत ही छोटा है जीवन
जिसमें घुल जाता है तन-मन
पल किसी की भी प्रतीक्षा
कर नहीं सकता
और जब जाता सरक तो
थम नहीं सकता
आओ कुछ सोचें,समझ लें
स्नेह पालें हम
और उसको बाँटकर
आनंद पा लें हम---।।
सस्नेह
डॉ.प्रणव भारती