संचय की आदत अच्छी है
दूजे के काम जो आती है
ज्ञान , पुण्य चाहे धन हो
यह मानवता को भाती है
संचय की विरासत सदियों से
चली आयी है अपनों से सदा
इसका उद्देश्य था सबका भला
इसका है चलन अब यदा - कदा
हम सब सीमित हैं अपने तक
चिंता नहीं अगली पीढ़ी की
हम टांग खींचते अपनों की
बेफिक्र हो भविष्य की सीढ़ी की
तालाब , कुएं और धर्मशालाएं
परहित के लिए बनवाते थे
संचित धन का यह सदुपयोग
कर जीवन भर पुण्य कमाते थे
आधुनिकता के चक्कर में
भूलें हम मानवता का भला
परिणाम हमारे सामने है
इसे देख के भर आता है गला
यह भूल - सुधार यदि कर लें हम
अब भी नहीं ज्यादा देर हुई
यदि अब भी नहीं संभलें हम सब
शायद ना बढ़े मौके की सुई
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