सकारात्मक सोच
सेठ मनोहरलाल श्रीनगर के एक प्रसिद्ध व्यवसायी थे जिनका कालीन बनाने का बहुत बडा कारखाना था। उनका विदेशो में भी निर्यात होता था। एक बार संयोग से उन्हें विदेश में कालीन निर्यात करने का बहुत बडा सौदा प्राप्त हुआ और वे इसी के निर्माण में व्यस्त थे।
एक दिन अचानक ही नदी में बाढ आ जाने के कारण पूरा श्रीनगर जलप्लावन से घिर गया। इस प्राकृतिक आपदा में सैकडो लोग मारे गए एवं बहुत आर्थिक क्षति हुयी। इस प्राकृतिक आपदा के कारण सेठ मनोहरलाल का कारखाना भी नष्ट हो गया एवं उसमें काम करने वाले कुशल कर्मचारी भी मारे गए। गोदामों में पानी भर जाने के कारण सेठ जी द्वारा बनाया गया सारा माल भी खराब हो चुका था। इस समय वे भयंकर आर्थिक तंगी में आ गये थे और इस आपदा में उनका घर भी गिरकर तहस नहस हो चुका था। ऐसी विकट परिस्थितयों में एक दिन राहत शिविर में जब सेठ मनोहरलाल भोजन कर रहे थे तो उनके एक परिचित व्यापारी मित्र ने पूछा कि भाई साहब ऐसी विकट परिस्थिति में जबकि आपका सबकुछ नष्ट हो चुका है परंतु आपके चेहरे पर चिंता एवं दुख की कोई लकीर भी नजर नही आ रही है। इसका क्या कारण है ?
सेठ जी ने जवाब दिया कि जो कुछ होता है सब प्रभु इच्छा से होता है और हमें उसे स्वीकार करना ही होता है। प्रभु की कृपा से ही मैंने धन कमाने की कला सीखी है। इस प्राकृतिक आपदा में भले ही मेरा अत्याधिक आर्थिक नुकसान हो गया है परंतु जिस कला से मैंने इतना धन कमाया था वह कला नष्ट नही हुई है और अभी भी मेरे दिल और दिमाग में बसी हुई है। मैं पुनः इसके माध्यम से अपने व्यवसाय को आरंभ करूँगा और एक दिन अपने को पुर्नस्थापित करके बता दूँगा। सेठ मनोहरलाल की यह बात सुनकर उनके मित्र को इस दुखद घडी में बहुत सांत्वना मिली और ऐसी सकारात्मक सोच से उसके मन में भी अपने व्यवसाय को पुनः स्थापित करने की हिम्मत पैदा हो गयी।