उम्र भर दीप की लौ जलाती रही एक ऑंधी क्या आई, अंधेरा हुआ
बैठ पलकों पे अश्रु सिसकने लगेजब भी लौ थरथराई बखेड़ा हुआ
चाँद के गाँव में चाँद की छाँह मेंकितने जुगनू चमकते रहे रात भर
हो सका न मिलन उससे पल एक भी हारकर कुनमुनाई सवेरा हुआ
चंद बातें सुनी,चाँद की राह मेंऔर हृदयों में अमृत छलकते रहे
पीर ऐसी जगी ज्यों पवन सिरफिरी गात में भरभराई ज्यों फेरा हुआ |