गुरु : क्या तुम मृत्यु से परिचित हो?
शिष्य : नहीं.
गुरु :फिर भी मृत्यु से डरे हुए हो?
शिष्य : हाँ
गुरु :तो तुम्हें मृत्यु से परिचित होना पड़ेगा, उसके बाद ही तुम डर से विजय कर पाओगे. मृत्यु को देखना पड़ेगा, मृत्यु को समझना होगा, मृत्यु से मिलना होगा.
शिष्य :कैसे जाने हम मृत्यु को?
गुरु :तुम्हें ध्यानी होना होगा, तुम्हें जागना होगा, वर्तमान मे रहना होगा.
शिष्य :कोई समान्य मनुष्य कैसे वर्तमान मे रह सकता है? वो तो बचपन से ही भविष्य के सपने देखने मे माहिर होता है. और कौनसा धर्म हमे वहा तक ले जाने मे मदद कर सकता है? क्या कोई भी मनुष्य वहा तक जा पाता है?
गुरु :जन्म से सब कोई समान्य होता है, कोई भी बालक कोई दिव्य शक्ति ले कर नहीं जन्म ता हे,
हर बालक जन्मे के पूर्व यानी गर्भ में से ही सपने देखता है पर हर कोई इंसान बुद्धत्व को पा सकता हे फिर भले ही वो बहेरा हो या अपंग हो.
कोई एक पेड़ की भले ही कितनी भी शाखाएं हो पर उनमे से जो फल पक जाते हे वो नीचे धरती पर ही गिरते हैं. संसार का कोई भी धर्म या समुदाय हो सबका रास्ता भले ही अलग - अलग हो पर मंजिल तो एक ही है. धर्म का उद्देश्य होम हवन नहीं होना चाहिये धर्म का उद्देश्य समाधि होना चाहिए. वैदिक काल से मनुष्य को भटकाया गया है, काल्पनिक कथाओ मे ऊलजाया गया है, सही मंजिल से भटकाया गया है. उसी लिए हिन्दू धर्म में अलग - अलग शाखाएं हैं.
शिष्य : तो हमारा उद्देश्य ध्यान के सिवा कुछ नहीं होना चाहिए ?
गुरु : हाँ.