quoting excerpt from a poem sent by a friend written by some unknown to me
*बरसात* गिरी
और *कानों* में इतना कह गई कि---------!
**गर्मी* *हमेशा
किसी की भी नहीं रहती*
*घमंड*-----------!
किसी का भी नहीं रहा,
*टूटने से पहले* ,
*गुल्लक* को भी लगता है कि ;
*सारे पैसे उसी के हैं* ।
जिस बात पर ,
कोई *मुस्कुरा* दे;
बात --------!
बस वही *खूबसूरत* है ।।
थमती नहीं,
*जिंदगी* कभी,
किसी के बिना ।।
मगर,
यह *गुजरती* भी नहीं,
अपनों के बिना ।।