यहां हर एक शख्स पहचान में नहीं आता।
अपना लगने वाला भी अपना नहीं होता।।
शहद जैसी बातें कर रहे लोगों में छुपा रहेता।
कब पीठ पर खंजर चलाए पता नहीं होता।।
दिल में कुछ और जुबा पर कुछ और ही होता।
ये अपनों के बीच छिपा हित शत्रु होता।।
कब? कहा? कैसे? ये दगा करे, पहेचान नहीं आता!
बच कर रहिए जनाब ये सदा अपना बनकर रहेता।।
करे तो कैसे करे पहेचान समझ नहीं आता।
अपना लगने वाला भी अपना नहीं होता।।
Darshana
Radhe Radhe