काश मेरे बस में ये होता
बचपन को वापस बुला लाती
किसी बात का गम न करती
हरदम हंसती ही रहती
काश मेरे बस में ये होता
माँ को फलक से जमीं पर
वापस बुला के लाती
उसकी आँचल की छाँव में
जन्नत को फिर पा लेती
काश मेरे बस में ये होता
आसमान पे सोते बाबा को
मैं नीचे उतार लाती
उनकी पीठ पे बैठ उन्हें
फिर से घोड़ा बनाती
काश मेरे बस में ये होता
सारी खुशियां खुदा से मांगती
सब में बराबर बाँट कर
चिर निंद्रा में खुद सो जाती