सुख की गंगा में हमने
दुख भी बहते देखे हैं,
फूलों के साथ-साथ
अस्थियां जाते देखे हैं।
पापों को धोते-धोते
पुण्य कमाना चाहा है,
काँटों पर चलते चलते
फूल खिलाना चाहा है।
हम जाग गये थे सुबह सबेरे
ममता पर बह कर आये थे,
दुनिया की हरियाली में हम
सूखे पर चलकर आये थे।
* महेश रौतेला