प्यार में बहुत उथल पुथल होती है
मन रोके नहीं रूकता,
पैर थामे नहीं थमते।
पानी को शान्त रहना आ गया है
ताल चुप लगता है,
पक्षियां ईमानदार हो गयी हैं
वृक्षों पर भी शान्ति छायी है।
रास्ते हैं
पर कोई चलने वाला नहीं है,
वह बात अलग थी कि
प्यार के दिनों में
हम यहाँ चला करते थे,
पढ़ने के लिए
विद्यालय जाया करते थे,
ठंड की आवाजाही में
प्यार की धुन में नाचा करते थे,
एकान्त यहीं ढूंढते थे
उसे बारबार स्वयं पर उडेलते थे।
हमारा लिखा-पढ़ा
दूर तक गया है,
इधर पक्षियां ईमानदार हो गयी हैं
वृक्षों पर भी शान्ति छायी है।
**महेश रौतेला