#कृष्णkiकविताhai
जनम में जो पाया सलाखा,
भागन में भी हिम्मत राखा।
बच्चन में, खुद से ही साधा।
पास खडी, पर दूर थी राधा।
अपनी रानी को ब्याहने,
राजा स्वयं दौड़कर भागा।
अपनो को ही मार पछाड़ा,
झट से तोडा दंभ का धागा!
जाके सखा, सभी दुखियारे;
एक एक कर सबको तारा।
कोई कहां मगर ये जाना
इतना जीते कितना हारा?!
जो जग तारे, गाड़ी हांके ;
साच जीताने ; खुद को मारा।
कोई काँध टेकन ना पाई,
आप ही पीया, सागर खारा!
सदा सुहासा, बंसी बजाता,
गीता गाता,रास रचाता,
तुझ को जितना जाने पाए ;
तुझ में चाहा जीवन सारा...
© लीना प्रतीश