सब कुछ तर जाने दो गंगा
मेरा मन इस जग में है,
जग का मन मुझमें है
सब कुछ तर जाने दो गंगे।
सीमायें जो लांघ रहा है
उन्हें मर जाने दो गंगे,
ईश्वर की इस धरती पर
शान्ति पसर जाने दो गंगे।
क्षण की स्पर्धा नहीं नहीं
असुर प्रवृत्ति की छाया यह गंगे,
दुख का कारण जो जन होये
उसे परास्त कर, पवित्र रह गंगे।
*महेश रौतेला