न जाने क्यूँ अब
ख्वाबों में सुनहरी परियां नहीं आतीं,
सफेद बर्फ से ढके पहाड़,
उनकी चोटी पर उड़ते बादल,
नीचे बहती नदी के किनारे
फूलों, पेडों से घिरा छोटा सा
सुंदर घर भी नजर नहीं आता,
गड़ित, अंग्रेजी की परीक्षा पूरी नहीं होती,
चाय कभी भी बन ही नहीं पाती,
अक्सर घर का रास्ता भूल जाती हूं,
सड़कों पर भटकती रह जाती,
ट्रेन कभी पकड़ ही नहीं पाती,
शायद वास्तविकता की पथरीली जमीन ने
मखमली ख्वाबों को भी खुरदुरा कर दिया।
#वास्तविक